Tuesday, August 28, 2007

Nine Forms




ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार

सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार


Hare Rama

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता 
मानउँ एक भगति कर नाता
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई 
धन बल परिजन गुन चतुराई
भगति हीन नर सोहइ कैसा 
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं 
सावधान सुनु धरु मन माहीं
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा 
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा 
पंचम भजन सो बेद प्रकासा
छठ दम सील बिरति बहु करमा 
निरत निरंतर सज्जन धरमा
सातवँ सम मोहि मय जग देखा
मोतें संत अधिक करि लेखा
आठवँ जथालाभ संतोषा 
सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा
नवम सरल सब सन छलहीना 
मम भरोस हियँ हरष दीना
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई 
नारि पुरुष सचराचर कोई
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि 
मोरे सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें


Lord of the universe Said to his Devotee that Listens O good lady_
I recognize no other kinship except that of Devotion, despite the cast, kinship, linage, piety, reputation wealth physical strength of the family, accomplishments, and ability, a man lacking devotion is of no more worth than a cloud without water,

Now I tell you nine forms of Devotion-listen devotedly and cherish them in mind

1. Fellowship with saints

2. Fondness for my stories

3. Humble service to the lotus feet of one's preceptor

4. Singing my praise with a guileless purpose

5. Muttering my name with unwavering faith

6. Practice self-control, adoring self-restraint as prescribed by Vedas

7. See the world full of me without distinction and reckon the saints as even greater than myself

8. remain contented with whatever gets and never think of detecting others

9. one should be guileless and straight in one's dealing with everyone and in heart cherish implicit faith in me without either exultation or depression,

Whosoever possesses any one of these nine forms of devotion, be he man or woman or any other creature, sentient or insentient, is most dear to me,
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नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि


सुनहु उदार सहज रघुनायक 
सुंदर अगम सुगम बर दायक
देहु एक बर मागउँ स्वामी 
जद्यपि जानत अंतरजामी
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ 
जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी 
जो मुनिबर सकहु तुम्ह मागी
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें 
अस बिस्वास तजहु जनि भोरें
तब नारद बोले हरषाई  
अस बर मागउँ करउँ ढिठाई
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका 
श्रुति कह अधिक एक तें एका
राम सकल नामन्ह ते अधिका 
होउ नाथ अघ खग गन बधिका
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम
अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ

अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी 
पुनि नारद बोले मृदु बानी
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया 
मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा 
प्रभु केहि कारन करै दीन्हा
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा 
भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी 
जिमि बालक राखइ महतारी
गह सिसु बच्छ अनल अहि 
धाई तहँ राखइ जननी अरगाई
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता 
प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी 
बालक सुत सम दास अमानी
जनहि मोर बल निज बल ताही 
दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं 
पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं

काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि

सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता 
मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता
जप तप नेम जलाश्रय झारी 
होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी
काम क्रोध मद मत्सर भेका 
इन्हहि हरषप्रद बरषा एका
दुर्बासना कुमुद समुदाई 
तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा 
होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा
पुनि ममता जवास बहुताई
लुहइ नारि सिसिर रितु पाई
पाप उलूक निकर सुखकारी 
नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी
बुधि बल सील सत्य सब मीना 
बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना

अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि

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जौं परलोक इहाँ सुख चहहू 
सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू
सुलभ सुखद मारग यह भाई 
भगति मोरि पुरान श्रुति गाई
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका 
साधन कठिन मन कहुँ टेका
करत कष्ट बहु पावइ कोऊ 
भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी 
बिनु सतसंग पावहिं प्रानी
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं संता 
सतसंगति संसृति कर अंता
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा 
मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा 
जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा

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कहहु भगति पथ कवन प्रयासा 
जोग मख जप तप उपवासा
सरल सुभाव मन कुटिलाई
था लाभ संतोष सदाई
मोर दास कहाइ नर आसा 
करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई 
एहि आचरन बस्य मैं भाई
बैर बिग्रह आस त्रासा 
सुखमय ताहि सदा सब आसा
अनारंभ अनिकेत अमानी 
अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा 
तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा
भगति पच्छ हठ नहिं सठताई 
दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई
मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह
ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह



Please be vegetarian_ॐ रामाया राम भद्राय राम चन्द्राया मानसा रघुनाथाया नाथाय सिताये पतिये नमः 

Please be vegetarian if possible as it helps to reach self.

Please be vegetarian if possible as it enhances love towards nature as species of life belong to it. 

Please be vegetarian if possible as it cares for the human body {carrier of soul} well

.Please be vegetarian if possible as it helps in meditation & enlightens the inner core.

Please be vegetarian if possible as much as you can.

Being non Vegetarian increases cruelty against animals,

Thanks, please.

बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग

परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम

देहु भगति रघुपति अति पावनि 
त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि
प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु 
होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु

May Lord bless all
Thanks, please 
Jai Sri Ram